(उत्तराखंड पलायन पर आधरित)
घर की पुकार!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
तेरी बचपन कि खुशियों को मैंने ही सजाया,
अपने गोदी में (आँगन ) मैंने तुझको खेल खिलाया!
सुनके तेरी किलकारी मैं भी खुश होता था,
दुःख होता था मेरे को भी तू गिरकर जब रोता था!
इक बार तो आके देख ले मैं किस हालत में हूँ,
नहीं रही उतनी ताकत हो रहा में अब जरजर हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
वो शाम नहीं आती है सब संग आँगन बैठा करते थे,
अपने-अपने सुख -दुःख आपस में बांटा करते थे!
इस प्यार भरे रंगीन माहौल में चार चाँद लग जाते थे,
गर्मागरम चाय के कप जब आँगन में आ जाते थे!आएगा जल्दी तू वापस , इसी इन्तजार में हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
अंदर ही अंदर खोखला हो रहा हूँ,
खुद को देख इस हाल में मन ही मन रो रहा हूँ!
सोचा न था इतना बेखबर तू हो जायेगा,
जहाँ सुकून नहीं है रातों दिन तू वहीं रह जाएगा!
बेजान समझ कर भूल न कर जिस दिन वापस आयेगा,
इस हाल में देख मुझको मन ही मन पछतायेगा!
तुझे यकीं न आएगा सोच के पागल हो जायेगा,
कि मै वही घर हूँ या कोई खंडहर हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
Written by-KISHOR SAKLANI
घर की पुकार!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
तेरी बचपन कि खुशियों को मैंने ही सजाया,
अपने गोदी में (आँगन ) मैंने तुझको खेल खिलाया!
सुनके तेरी किलकारी मैं भी खुश होता था,
दुःख होता था मेरे को भी तू गिरकर जब रोता था!
इक बार तो आके देख ले मैं किस हालत में हूँ,
नहीं रही उतनी ताकत हो रहा में अब जरजर हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
वो शाम नहीं आती है सब संग आँगन बैठा करते थे,
अपने-अपने सुख -दुःख आपस में बांटा करते थे!
इस प्यार भरे रंगीन माहौल में चार चाँद लग जाते थे,
गर्मागरम चाय के कप जब आँगन में आ जाते थे!आएगा जल्दी तू वापस , इसी इन्तजार में हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
अंदर ही अंदर खोखला हो रहा हूँ,
खुद को देख इस हाल में मन ही मन रो रहा हूँ!
सोचा न था इतना बेखबर तू हो जायेगा,
जहाँ सुकून नहीं है रातों दिन तू वहीं रह जाएगा!
बेजान समझ कर भूल न कर जिस दिन वापस आयेगा,
इस हाल में देख मुझको मन ही मन पछतायेगा!
तुझे यकीं न आएगा सोच के पागल हो जायेगा,
कि मै वही घर हूँ या कोई खंडहर हूँ!
हाँ मै वही घर हूँ, लेकिन अब खंडहर हूँ!
Written by-KISHOR SAKLANI
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