Monday, March 13, 2017

How To live your Childhood Without Father..

               पापा बिन बचपन!

रूठा रूठा लगता हैं,खुद को ही अपना मन.
कैसे जीता हूँ, पापा के प्यार बिना ये बचपन.

माँ की व्याकुलता को अब कौन भला समझेगा.
मेरी बचपन की खुशियों को कौन संजोएगा.
न सोचा जीवन रचने वाला इतना निर्दयी होगा.
खुशियां मेरी छीन, कर देगा सूना बचपन.

रूठा रूठा लगता हैं,खुद को ही अपना मन.
कैसे जीता हूँ, पापा के प्यार बिना ये बचपन.

जब चीज त्यौहार के दिन आते हैं, सब बच्चे खुश हो जाते है.
इन प्यार भरे दिनों में उनके पापा घर आ जाते हैं.
चीज,खिलोनो और नए कपडे बच्चो के लिए ले आते हैं .
माँ कहती थी, नाराज न हो तू इस बार में न ला पाऊँगी.
चीज, खिलोने, नए कपडे अगली बार ले आउंगी.
देख खिलोने औरों के, बहला लेता हूँ ये बचपन.

रूठा रूठा लगता हैं,खुद को ही अपना मन.

कैसे जीता हूँ, पापा के प्यार बिना ये बचपन. 

जब बच्चे अपने पापा के संग खेल खेलने जाते हैं.

उनके पापा भी उनके संग बच्चे ही बन जाते हैं.
कभी बच्चों को पीठ में बिठाकर मस्त मगन हो जाते हैं.
कभी प्यार से बच्चो को झुला झुलाते रहते हैं.
देख के ये सब मुझको पापा याद तुम्हारी आती है.
तुम होते मेरा भी होता, खुशियो से भरा ये बचपन.

रूठा रूठा लगता हैं,खुद को ही अपना मन.

कैसे जीता हूँ, पापा के प्यार बिना ये बचपन.


                                 written by-Kishor saklani





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